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  • Feb 14 2020 6:54AM
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न्याय व्यवस्था की विडंबना

आकार पटेल
लेखक एवं स्तंभकार 
aakar.patel@gmail.com
 
भारत का सर्वोच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान लेते हुए शाहीन बाग के विरोध प्रदर्शन के दौरान एक नवजात की मृत्यु के मामले की सुनवाई करना चाहता है. न्यायालय इस प्रदर्शन द्वारा यातायात बाधित होने के मामले की भी अलग से सुनवाई कर रहा है. सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस कार्रवाई में 25 प्रदर्शनकारियों की मौत के मामले की सुनवाई नहीं की है.
 
उसने उस मामले को भी नहीं सुना, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ प्रदर्शनकारियों की संपत्ति को गैरकानूनी ढंग से जब्त करना शुरू कर दिया. उसने उस मामले में भी हस्तक्षेप नहीं किया, जिसमें बीदर के एक स्कूल में मंचित नाटक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना की गयी थी और इस वजह से पुलिस ने बच्चों से बार-बार पूछताछ की.
 
सर्वोच्च न्यायालय ने कश्मीरी नेताओं को बगैर किसी आरोप अथवा सुनवाई के बंद किये जाने के मामले पर भी सुनवाई नहीं की. उसने कश्मीरियों को इंटरनेट के इस्तेमाल का अधिकार भी नहीं दिया, हालांकि जनवरी में अदालत ने इस बारे में कई सदाशयी बातें कही भी थीं. अदालत ने सीएए पर रोक भी नहीं लगायी, जबकि जजों को यह बताया गया था कि ऐसा अंदेशा है कि इसने एक गंभीर आंदोलन और अशांति पैदा कर दी है. 
 
उसने असम के जेल शिविरों में पड़े उन एक हजार लोगों को भी न्याय नहीं दिया, जिन्हें बगैर अपराध के ही जेल में रखा गया है, जिन्हें परिजनों से अलग कर दिया गया है और जिनके पास इस स्थिति से उबरने का कोई रास्ता भी नहीं है. सर्वोच्च न्यायालय ने तब भी कोई हस्तक्षेप नहीं किया, जब कुछ दिन पहले सरकार ने यह घोषणा की कि इन शिविरों के सभी गैर-मुस्लिमों को छोड़ दिया जायेगा और केवल मुस्लिम ही इन जेलों में बचे रहेंगे.
 
उस मामले की भी सुनवाई नहीं हुई कि असम की राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) से बाहर रह गये 19 लाख लोगों में मुस्लिमों को अपनी नागरिकता साबित करने का मौका कब दिया जायेगा. असम एनआरसी की प्रक्रिया की गंभीर अनियमितताओं की भी सुनवाई नहीं हुई, जिसमें यह भी शामिल है कि जिन गणकों ने सबसे ज्यादा लोगों को गैरकानूनी करार दिया, उन्हें सरकार की ओर से दो वर्षों का सेवा विस्तार दिया गया. अदालत ने उन लोगों के मामले भी नहीं सुने, जिन्हें कागजात में सिर्फ वर्तनी की गलतियों और तिथियों की भिन्नताओं जैसी वजहों के लिए भी विदेशी करार दिया गया.
 
अदालत ने उस जमीन को ले लिया, जिस पर बाबरी मस्जिद थी और उसे उन लोगों को दे दिया, जिन्होंने मस्जिद ढाह दी थी. पर इसने उन लोगों पर कोई कड़ाई नहीं की, जिन पर मस्जिद तोड़ने के आरोप लगे. एनआरसी और एनपीआर को गैरकानूनी तरीके से एक साथ संबद्ध कर दिया गया है, पर सर्वोच्च न्यायालय ने इसे सुनवाई के लायक भी नहीं माना. मैं ऐसे मामलों की सूची और भी बढ़ा सकता हूं, मगर अभी यहीं रुक जाना चाहूंगा. तथ्य यह है कि सर्वोच्च न्यायालय को भारतीय मुसलमानों के विरुद्ध पक्षपाती एवं पूर्वाग्रही समझा जाता है. 
 
यह इसके व्यवहार में भी दृष्टिगोचर होता है. एक ऐसे समय में जब दुनिया अचंभे में है कि भारत अपने ही नागरिकों के साथ क्या कर रहा है, जब लाखों लोग अपने वजूद के लिए सड़कों पर हैं और जब यहां एक सैद्धांतिक एवं खुले तौर पर पूर्वाग्रही सरकार है, यह अदालत के लिए भी खतरनाक है कि वह बहुसंख्यकवाद के रास्ते पर ही चलना जारी रखे.
 
कानून का शासन पर चलने की भारत की वह शोहरत, जिसके अंतर्गत अल्पसंख्यकों का संरक्षण किया जाता है, मोदी सरकार द्वारा तार-तार की जा चुकी है. 
 
इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि यूरोपीय संसद के बहुमत सदस्यों द्वारा एक ऐसा प्रस्ताव लाया जायेगा, जिसमें भारत के एक कानून की निंदा की जायेगी. मगर जब चंद दिनों बाद ही विदेश मंत्री एस जयशंकर ब्रसेल्स पहुंचेंगे, तो उनका सामना इन्हीं सब चीजों से होगा. इसकी भी कल्पना नहीं की जा सकती थी कि अमेरिकी कांग्रेस के 59 सांसद एक ऐसे प्रस्ताव का समर्थन करेंगे, जो उमर 7अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती की रिहाई और कश्मीरियों के लिए इंटरनेट की सुविधा बहाल करने की मांग करेगा. मगर यही सब हुआ है. 
 
सर्वोच्च न्यायालय के जजों की तादाद 1950 में आठ थी, जो आज 33 तक पहुंच चुकी है. मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में तीन जजों की एक पीठ के अतिरिक्त 13-14 खंडपीठें दो जजों की होती हैं, जो रोजाना नियमित रूप से सुनवाई किया करती हैं. किसी भी अन्य सर्वोच्च न्यायालय में दो जजों की ऐसी पीठों के लिए अदालतें नहीं हैं. अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में, जिसके आधार पर ही भारत की अदालतों का स्वरूप निर्धारित किया गया है, 12 जजों की सिर्फ एक अदालत है. 
 
पर, क्या इतनी अदालतों से कोई न्याय निकल रहा है? इस सवाल का जवाब उन्हीं लोगों की ओर से आना चाहिए, जिनके साथ यह राज्य आज क्रूरतापूर्ण बरताव कर रहा है. क्या भारत के मुसलमान यह सोचते हैं कि उन्हें इस मुल्क से और खासकर यहां की सर्वोच्च न्यायालय से इंसाफ मिल रहा है? उनकी ओर से मैं नहीं बोल सकता, पर यदि मुझे एक अनुमान लगाना ही हो, तो मेरा जवाब एक अत्यंत दृढ़ ना में ही होगा.  
(यह लेखक का निजी विचार है.)  
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