Sampadkiya

  • Feb 26 2020 12:26AM
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तुरंत रुके हिंसा

 दिल्ली के कई इलाकों में हुई हिंसा बेहद चिंताजनक है. हिंसक भीड़ द्वारा गोली, बम, पत्थरों और लाठियों का इस्तेमाल हुआ और बड़े स्तर पर आगजनी हुई है. गृहमंत्री अमित शाह, उपराज्यपाल अनिल बैजल और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक में अधिक संख्या में पुलिसकर्मियों की तैनाती तथा राजनीतिक दलों के नेताओं की मदद से हालात को काबू में करने का फैसला लिया गया है. उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्द ही अमन-चैन की बहाली हो सकेगी. दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश की राजधानी में बड़े स्तर पर हिंसा की घटनाएं हुई हैं तथा शासन-प्रशासन की ओर से समुचित कार्रवाई में देरी हुई.

 
 ऐसा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा के दौरान होना तो और भी अचरज की बात है. हिंसा की आशंकाएं तो थीं ही, क्योंकि लगातार भड़काऊ बयान दिये जा रहे थे. दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में अनेक प्रदर्शन हो रहे हैं तथा इस कानून के पक्ष में भी रैलियां निकाली गयी हैं.
 
 लेकिन इसे सांप्रदायिक बनना अफसोसनाक है. शांतिपूर्ण तरीके से विरोध या समर्थन करना और उन्मादी भीड़ का हमलावर होना बिल्कुल अलग-अलग बातें हैं. तनावपूर्ण माहौल में या संवेदनशील स्थानों पर पुलिस तंत्र और प्रशासनिक अमले का प्राथमिक काम हिंसा को रोकना होता है. 
 
शासन-प्रशासन को बीते दिनों की लापरवाहियों व निष्क्रियता से सबक लेकर आगे अपने कर्तव्य का निर्वाह करना चाहिए तथा ऐसा कोई व्यवहार नहीं करना चाहिए, जिससे यह संदेश जाये कि पुलिस उपद्रवियों के प्रति नरम है.
 
 इन घटनाओं से राष्ट्रीय राजधानी में सामाजिक ताने-बाने को गहरा आघात लगा है और सरकार से लेकर समाज को न केवल आपसी भरोसे व भाईचारे को कायम करने पर ध्यान देना है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि ऐसी हिंसा की पुनरावृत्ति न हो. दिल्ली हो या देश हो, सांप्रदायिकता की आग हमें कई बार झुलसा चुकी है. जिसकी जान जाती है, उसके परिवार की पूरी दशा और दिशा बदल जाती है. एक घर बनाने या एक दुकान खड़ा करने में लोगों की उम्र गुजर जाती है. 
 
लेकिन हिंसा का एक झटका सब कुछ राख कर देता है. ऐसा बार-बार हो चुका है, पर शायद हमने कोई सबक नहीं लिया. इस वजह से ऐसी चुनौतियां का सामना भी बार-बार करना पड़ता है. इन घटनाओं के पीछे भड़काऊ बयानों और हिंसक मानसिकता के साथ अफवाहों और अपुष्ट खबरों का भी हाथ होता है. आज सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया के दौर में गलत सूचनाएं जल्दी फैलती हैं.
 
 इस संदर्भ में भी आत्मसमीक्षा की जरूरत है. यह भी सोचा जाना चाहिए कि अगर सरकारी तंत्र, राजनीतिक व सामाजिक संगठन तथा आम नागरिक सचेत नहीं रहें, तो ऐसी घटनाएं होती रहेंगी और हम अफसोस जाहिर करने के अलावा कुछ न कर सकेंगे. फिलहाल, यही आशा व अपेक्षा है कि दिल्ली में तुरंत शांति स्थापित हो.     
 

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