Sampadkiya

  • Feb 27 2020 1:08AM
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बढ़ता वायु प्रदूषण

 हमारे देश की शहरी आबादी का बड़ा हिस्सा जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर है. यह खतरनाक स्थिति आज नहीं बनी है और तमाम सरकारी दावों के बावजूद कोई सुधार होता नहीं दिख रहा है. वायु गुणवत्ता सूचकांक, 2019 में एक बार फिर भारतीय शहरों की दुर्दशा जगजाहिर हुई है. सबसे प्रदूषित 30 शहरों में 21 हमारे देश में हैं. दिल्ली सबसे अधिक प्रदूषित राजधानी है, वहीं 98 देशों में भारत छठें पायदान पर है. 

 
शहरों में सबसे चिंताजनक स्थिति गाजियाबाद की है. बीते साल नवंबर-दिसंबर में दिल्ली समेत अनेक शहरों में हवा इस हद तक दूषित हो गयी थी कि आपात स्थिति की घोषणा करनी पड़ी थी. दक्षिण एशिया के तीन देशों- भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश- के 27 शहर सर्वाधिक प्रदूषित 30 देशों में शामिल हैं. 
 
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, जहरीली हवा में सांस लेने की वजह से करीब 70 लाख लोग असमय मौत के शिकार हो जाते हैं. इस समस्या से जनित बीमारियों के पीड़ितों की संख्या करोड़ों में है. हाल के एक शोध में यह भी जानकारी दी गयी है कि प्रदूषण का असर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है. बीमारियों और दुष्प्रभावों के कारण कामकाज भी प्रभावित होता है.
 
 इसके अलावा यह भी संज्ञान में लिया जाना चाहिए कि पहले से ही दबाव से जूझ रही स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी इस समस्या का नकारात्मक असर होता है. भारत ने स्वच्छ वायु सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया है, जिसके तहत 2024 तक 102 शहरों में प्रदूषण को 2017 के स्तर पर लाने की योजना है. 
 
जब दिल्ली या अन्य शहरों में गुणवत्ता खतरनाक रूप से गिर जाती है, तब वाहनों, निर्माण कार्यों तथा उद्योगों पर अस्थायी रोक लगाने जैसे उपाय किये जाते हैं. इस बार बजट में पुराने ऊर्जा संयंत्रों को बंद करने, सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने आदि पहल भी सराहनीय हैं. 
 
स्वच्छ भारत योजना भी कारगर हो रही है. लेकिन जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण क्षरण तथा जल व भूमि प्रदूषण जैसी चुनौतियों को देखते हुए ठोस व तात्कालिक पहलों की आवश्यकता बनी हुई है. नदियों को साफ करने तथा पेयजल व्यवस्था को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाने की कोशिशों को सफल बनाना बेहद जरूरी है. वायु प्रदूषण का सीधा संबंध उद्योगों व वाहनों से है. 
 
इन्हें बेहतर करने के लिए तकनीक में निवेश करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए. सूचकांक में चीन के शहरों की स्थिति अच्छी होती दिख रही है. वहां पानी और जमीन के भी बेहतर होने के नतीजे सामने आ चुके हैं. हमें उन अनुभवों को अपने यहां लागू करने पर विचार करना चाहिए. 
 
प्रदूषण की मार सबसे अधिक उत्तर भारत में है. इसके नुकसान की कीमत भी बहुत अधिक है. इसलिए यदि रोकथाम व नियंत्रण पर जोर दिया जाये, तो नुकसान को रोका जा सकता है तथा स्वस्थ भारत की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है. इसके लिए सरकारों, उद्योगों और लोगों को मिलजुल कर काम करना होगा.  
 

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